इसमें जनता कि गलती है , हमारी नहीं



स्टेशन पर भगदड़, दो मरे; रविवार को ऐन वक्त पर बिहार जाने वाली दो ट्रेनों विक्रमशिला और सप्तक्रांती का प्लेटफार्म बदलने से भगदड़ मची जिसमे महिला और एक बच्चे की मौत हो गई तथा 36 लोग घायल हो गए। आठ अस्पताल में भर्ती हैं।

                                                                                                        
  दैनिक जागरण, 17 May 2010


                         लीजिए आ गयी अब दीदी जी की बारी, बोलने के लिए कुछ तो चाहिए. सो बोल दिया बिना सोचे-समझे -- "इसमें जनता कि गलती है, सरकार कि नहीं". मैं बात कर रहा हूँ दो दिन पहले हुए, नई दिल्ली के रेलवे हादसे की. तो ऐसा है कि गाड़ी जिस प्लेटफ़ॉर्म पे आने वाली थी वहां नहीं आ कर आनन-फानन में दुसरे प्लेटफ़ॉर्म पे आ गयी. इस तरह प्लेटफ़ॉर्म बदले जाने से जो भी लोग इन्तेजार कर रहे थे उनकी भगदड़ में दो कि मौत हो गयी. और ऐसा सिर्फ इस लिए हुआ कि रेलवे प्लेटफ़ॉर्म कि अदलाबदली बिना किसी पूर्व सूचना के कि गयी. जिससे बिहार आने वाली दो ट्रेनों के यात्रियों में काफी भगदड़ हुई और परेशानी का सबब बानी.

हर साल ही ऐसा कहीं ना कहीं होता ही है और हर बार सरकार नए नियम कानून बनती ही है. मगर, कानून पे कितना अमल होता है ये तो आप भी जानते हैं और हम भी. मरने वालों को मुआवजा दिया जाता है; लेकिन क्या ये मुआवजा भी सही तरीके से मिलता है या नहीं, किसको पता? किसी के घर का चिराग चला गया..... और अपनी सरकार मुआवजे कि रकम दे कर रुपये से पीड़ितों का मुह बंद करना चाहती है. यानि कि हमारी सरकार पहले से तयार रहती है कि अगर हादसा होता है तो मुआवजा दे कर सबको चुप करा देंगे. और शायद हर किस्म के हादसे के अनुसार मुआवजे के रकम का एक खाका भी तयार होगा. क्या कहें; कहते हुए भी बड़ी शर्म आती है कि बड़ी ढीठ है ये अपनी सरकार. और ऊपर से दीदी जी कहतीं हैं कि "इसमें जनता कि गलती है, सरकार कि नहीं". वाह !! एक तो चोरी ऊपर से सीना जोरी..... बहुत अच्छे.

बात मानने वाली हो या ना हो, लेकिन मेरा मानना है कि लालू जी के रेलमंत्री रहते ये सब नहीं होता था. बहुत से रेलमंत्री आए और गाए. मगर लालू जी के नेतृत्व में जो रेलवे ने तरक्की कि वो शायद कभी नहीं कर पायेगी. इसीलिए कहते हैं ना "जिसका कम उसी को सजे .........". खैर !! जाने दीजिये. अपना कम तो है मरने को तयार रहना और मुआवजे कि रकम पाने के लिए लड़ते रहना.

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